केडी विश्वविद्यालय के चिकित्सा-शिक्षा संस्थान केडी मेडिकल कॉलेज-हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के सामुदायिक चिकित्सा विभाग द्वारा मंगलवार को ‘मेडिसर्च-2026’ के तहत अनुसंधान पद्धति और जैवसांख्यिकी पर सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) कार्यक्रम का आयोजन किया गया। सीएमई में मुख्य अतिथि मीनाक्षी अम्मल डेंटल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, चेन्नई के पब्लिक हेल्थ डेंटेस्ट्री विभाग के प्रो. (डॉ.) श्याम सिवासामी ने विभिन्न मेडिकल और डेंटल कॉलेजों के स्नातकोत्तर छात्र-छात्राओं तथा संकाय सदस्यों को बताया कि स्वास्थ्य विज्ञान और चिकित्सा अनुसंधान में जैवसांख्यिकी का बहुत महत्व है। इससे चिकित्सकों तथा शोधकर्ताओं को वैज्ञानिक डेटा संग्रह, सटीक विश्लेषण और अध्ययन डिजाइन के व्यावहारिक कौशल में मदद मिलती है।

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के मार्गदर्शन में आयोजित सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरुण अग्रवाल, केडी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मनेष लाहौरी, प्रो. (डॉ.) श्याम सिवासामी, के.डी. मेडिकल कॉलेज के डीन और प्राचार्य डॉ. आर.के. अशोका, डॉ. गगन दीप कौर, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. गगन दीप सिंह, कुलसचिव डॉ. विकास कुमार अग्रवाल, केडी डेंटल कॉलेज की प्राचार्या डॉ. नवप्रीत कौर और प्रो. (डॉ.) अमनजोत कौर आदि ने मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित कर किया। विभागाध्यक्ष सामुदायिक चिकित्सा एवं उप-प्राचार्या केडीएमसीएचआरसी डॉ. गगनदीप कौर एवं डॉ. अमनजोत कौर ने सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।

सीएमई की समन्वयक डॉ. गगनदीप कौर ने अतिथि वक्ता का परिचय देते हुए बताया कि सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम का उद्देश्य छात्र-छात्राओं तथा संकाय सदस्यों को जैवसांख्यिकी के उन विषयों की बुनियादी समझ प्रदान करना था, जिनके बारे में प्रायः वे सिर्फ सुनते रहते हैं। डॉ. कौर ने कहा कि मेडिकल कॉलेज के छात्र-छात्राओं और संकाय सदस्यों के लिए जैवसांख्यिकी हमेशा एक अपरिचित क्षेत्र के रूप में देखा जाता है, इस सीएमई का उद्देश्य उन्हें किसी भी शोध प्रश्न को समझने और उसके विश्लेषण को आगे बढ़ाने का एक बेहतर तरीका प्रदान करना था।

मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरुण अग्रवाल ने कहा कि हर क्षेत्र में अनुसंधान का महत्व है, ऐसे में जो भी सीखने के अवसर मिलें उनका लाभ उठाना प्रत्येक चिकित्सा पेशेवर का कर्तव्य है। कुलपति डॉ. मनेष लाहौरी ने आयोजन की प्रशंसा करते हुए कहा कि आधुनिक चिकित्सा नए शोध और साक्ष्यों के आधार पर उपचारों को लगातार अद्यतन करती रहती है तथा मूलभूत एवं अनुप्रयुक्त विज्ञान के माध्यम से विकसित होती रहती है। उन्होंने बताया कि स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एक महत्वपूर्ण चरण है जो भविष्य में चिकित्सा पद्धति के लिए वैज्ञानिक, तर्कसंगत और नैतिक आधार तैयार करती है। इसलिए, इस चरण के दौरान शोध करने का अवसर चिकित्सक को अधिक तर्कसंगत, तार्किक और जिम्मेदार बनाने के साथ-साथ शोध में रुचि भी पैदा करता है।

के.डी. मेडिकल कॉलेज के डीन और प्राचार्य डॉ. आर.के. अशोका ने सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम को मेडिकल शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में शोधकर्ताओं के योगदान को बेहतर बनाने के लिए ही राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने स्नातकोत्तर छात्र-छात्राओं के शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शोध पद्धति प्रशिक्षण को एकीकृत करने तथा अंतिम परीक्षा में बैठने के लिए शोध पत्र प्रकाशित करने या प्रस्तुत करने को अनिवार्य किया है।

प्रो. (डॉ.) श्याम सिवासामी ने सीएमई में शामिल विभिन्न मेडिकल कॉलेजों तथा डेंटल कॉलेजों के प्रतिभागियों को अनुप्रयुक्त जैवसांख्यिकी का अवलोकन, आनुमानिक सांख्यिकी, आंकड़ों के विश्लेषण और सार्थकता के लिए उपयुक्त सांख्यिकीय परीक्षणों का चयन, अध्ययन डिजाइन, विभिन्न नमूनाकरण तकनीकें, रोग की पहचान, सांख्यिकीय विश्लेषण के लिए एमएस एक्सेल-एसपीएसएस पर मास्टर चार्ट तैयार करना, सांख्यिकीय विश्लेषण की व्याख्या और नमूना आकार की गणना आदि विषयों पर अपने अनुभव साझा किए।

रिसोर्स पर्सन डॉ. गगन दीप कौर तथा प्रो. (डॉ.) अमनजोत कौर ने भी चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में अनुसंधान पद्धति और जैवसांख्यिकी की महत्ता पर सारगर्भित उद्गार व्यक्त किए। सीएमई में के.डी. मेडिकल कॉलेज, के.डी. डेंटल कॉलेज, के.एम. मेडिकल कॉलेज, एफएच मेडिकल कॉलेज, जीएलए विश्वविद्यालय, जीएमसी मेवात (हरियाणा), श्री वेंकटेश्वर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज गजरौला आदि के स्नातकोत्तर छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की। सीएमई की सफलता में डॉ. गगन दीप कौर, डॉ. अमनजोत कौर, डॉ. बिश्वा बिनोद सनफुई, डॉ. स्वेता सिंह, डॉ. शुभ्रा दुबे, डॉ. निखिल थोराट और अंकुर कुमार आदि का अमूल्य योगदान रहा।

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