केडी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, मथुरा में 16 वर्षीय बच्ची साँस लेने की समस्या के साथ आई। यहां पहुंचते समय बच्ची की हालत बेहद नाजुक थी। उसे सांस लेने में गंभीर परेशानी हो रही थी और उसे वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। वेंटिलेटर पर लेते समय बच्ची की स्थिति अत्यंत चिंताजनक थी।

हॉस्पिटल में इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. शुभम द्विवेदी ने बच्ची की स्थिति का विस्तार से मूल्यांकन किया। उन्होंने बताया कि पहले बच्ची को बुखार आया, इसके बाद उसके प्लेटलेट्स कम हो गए। बाद में उसे सांस की तकलीफ बढ़ गई और हार्ट बीट भी बहुत कम हो गई, जिसके कारण उसे कार्डियोवर्ज़न ट्रीटमेंट देना पड़ा।

Accurate Treatment

पूरे वर्कअप के बाद बच्ची में DAH (डिफ्यूज़ एल्वोलर हेमरेज) का निदान किया गया। इस स्थिति में बच्ची की सांस की नलियां और फेफड़ों के अंदरूनी हिस्से खून से भर गए थे और फेफड़े पूरी तरह सूज चुके थे। यह एक अत्यंत गंभीर स्थिति थी, जिसे अक्सर ARDS (एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम) समझ लिया जाता है, इसलिए सही और समय पर डायग्नोसिस बेहद जरूरी होता है।

इलाज के दौरान ब्रोंकोस्कोपी के माध्यम से फेफड़ों की सफाई की गई। इसके साथ ही संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए हेवी एंटीबायोटिक्स शुरू की गईं और फेफड़ों की सूजन को कम करने के लिए विशेष थैरेपी दी गई। चूंकि बच्ची में संक्रमण के कारण DAH विकसित हुआ था और प्लेटलेट्स भी कम हो गए थे, इसलिए दोनों समस्याओं का एक साथ इलाज किया गया।

सही इलाज और विशेषज्ञ देखभाल का नतीजा यह रहा कि केवल तीन दिनों में बच्ची की हालत में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला और उसे सफलतापूर्वक वेंटिलेटर से हटा लिया गया। एक सप्ताह बाद किए गए CT स्कैन में यह स्पष्ट हुआ कि बच्ची के फेफड़े पूरी तरह साफ हो चुके हैं। आज बच्ची पूरी तरह स्वस्थ है और अपने सामान्य जीवन में लौट चुकी है।

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